श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.14.34

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

एवमध्वन्यवरुन्धानो मृत्युगजभयात्तमसि गिरिकन्दरप्राये॥ ३३॥ क्‍वचिच्छीतवाताद्यनेकदैविकभौतिकात्मीयानां दुःखानां प्रतिनिवारणेऽकल्पो दुरन्तविषयविषण्ण आस्ते॥ ३४॥ क्‍वचिन्मिथो व्यवहरन् यत्किञ्चिद्धनमुपयाति वित्तशाठ्येन ॥ ३५॥

kvacicchītavātādyanekadaivikabhautikātmīyānāṃ duḥkhānāṃ pratinivāraṇe'kalpo durantaviṣayaviṣaṇṇa āste|| 34||

अर्थ

कभी-कभी शीत, वायु आदि अनेक प्रकारके आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक दुःखोंकी निवृत्ति करनेमें जब असफल हो जाता है, तब उस समय अपार विषयोंकी चिन्तासे यह खिन्‍न हो उठता है॥ ३४॥

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