श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.14.32

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

क्‍वचिद् द्रुमवदैहिकार्थेषु गृहेषु रंस्यन् यथा वानरः सुतदारवत्सलो व्यवायक्षणः॥ ३२॥

kvacid drumavadaihikārtheṣu gṛheṣu raṃsyan yathā vānaraḥ sutadāravatsalo vyavāyakṣaṇaḥ|| 32||

अर्थ

वृक्षोंके समान जिनका लौकिक सुख ही फल है—उन घरोंमें ही सुख मानकर वानरोंकी भाँति स्त्री-पुत्रादिमें आसक्त होकर यह अपना सारा समय मैथुनादि विषय-भोगोंमें ही बिता देता है॥ ३२॥

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