॥ श्रीहरिः ॥
कदाचिन्मनोरथोपगतपितृपितामहाद्यसत्सदिति स्वप्ननिर्वृतिलक्षणमनुभवति॥ १७॥ क्वचिद् गृहाश्रमकर्मचोदनातिभरगिरिमारुरुक्षमाणो लोकव्यसनकर्षितमनाः कण्टकशर्कराक्षेत्रं प्रविशन्निव सीदति॥ १८॥ क्वचिच्चदुःसहेन कायाभ्यन्तरवह्निना गृहीतसारः३ स्वकुटुम्बाय क्रुध्यति॥ १९॥ स एव पुनर्निद्राजगरगृहीतोऽन्धे तमसि मग्नः शून्यारण्य इव शेते नान्यत् किञ्चन वेद शव इवापविद्धः॥ २०॥✎ 943
kvaciccaduḥsahena kāyābhyantaravahninā gṛhītasāraḥ svakuṭumbāya krudhyati|| 19||
अर्थ
कभी पेटकी असह्य ज्वालासे अधीर होकर अपने कुटुम्बपर ही बिगड़ने लगता है॥ १९॥
क्वचिच्चदुःसहेन कायाभ्यन्तरवह्निना गृहीतसारः स्वकुटुम्बाय क्रुध्यति॥ १९॥
कभी पेटकी असह्य ज्वालासे अधीर होकर अपने कुटुम्बपर ही बिगड़ने लगता है॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.14.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 633) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/14/19/टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—गृहीतगतसारः।
(मुद्रित पृष्ठ 633)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #943 शब्दोंके बीचका स्थान: स्वप्ननिर्वृतिलक्षणमनुभवति॥१७॥ → स्वप्ननिर्वृतिलक्षणमनुभवति॥ १७॥