॥ श्रीहरिः ॥
एकदासत्प्रसङ्गान्निकृतमति१र्व्युदकस्रोतःस्खलनवदुभयतोऽपि दुःखदं पाखण्डमभियाति॥ १३॥ यदा तु परबाधयान्ध आत्मने नोपनमति तदा हि पितृपुत्रबर्हिष्मतः पितृपुत्रान् वा स खलु भक्षयति॥ १४॥ क्वचिदासाद्य गृहं दाववत्प्रियार्थविधुरमसुखोदर्कं शोकाग्निना दह्यमानो भृशं निर्वेदमुपगच्छति ॥ १५॥ क्वचित्कालविषमितराजकुलरक्षसाऽपहृतप्रियतमधनासुःप्रमृतक२ इव विगतजीवलक्षण आस्ते॥ १६॥✎ 942 1533
ekadāsatprasaṅgānnikṛtamatirvyudakasrotaḥskhalanavadubhayato'pi duḥkhadaṃ pākhaṇḍamabhiyāti|| 13||
अर्थ
कभी असत् पुरुषोंके संगसे बुद्धि बिगड़ जानेके कारण सूखी नदीमें गिरकर दुःखी होनेके समान इस लोक और परलोकमें दुःख देनेवाले पाखण्डमें फँस जाता है॥ १३॥
एकदासत्प्रसङ्गान्निकृतमतिर्व्युदकस्रोतःस्खलनवदुभयतोऽपि दुःखदं पाखण्डमभियाति॥ १३॥
कभी असत् पुरुषोंके संगसे बुद्धि बिगड़ जानेके कारण सूखी नदीमें गिरकर दुःखी होनेके समान इस लोक और परलोकमें दुःख देनेवाले पाखण्डमें फँस जाता है॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.14.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 633) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/14/13/टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—मतिर्विदिक्स्रोतःस्वनेन स्खलन०।
(मुद्रित पृष्ठ 633) - २
प्रा० पा०—मृत इव।
(मुद्रित पृष्ठ 633)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #942 शब्दोंके बीचका स्थान: पाखण्डमभियाति॥१३॥ → पाखण्डमभियाति॥ १३॥
- #1533 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: र्व्युदकस्रोत:- स्खलनवदुभयतोऽपि → र्व्युदकस्रोतःस्खलनवदुभयतोऽपि