श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.14.10

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

तत्र च क्‍वचिदातपोदकनिभान् विषयानुपधावति पानभोजनव्यवायादिव्यसनलोलुपः॥ ६॥ क्‍वचिच्चाशेषदोषनिषदनं पुरीषविशेषं तद्वर्णगुणनिर्मितमतिः सुवर्णमुपादित्सत्यग्‍निकामकातर इवोल्मुकपिशाचम्॥ ७॥ अथ कदाचिन्‍निवासपानीयद्रविणाद्यनेकात्मोपजीवनाभिनिवेश एतस्यां संसाराटव्यामितस्ततः परिधावति॥ ८॥ क्‍वचिच्च वात्यौपम्यया प्रमदयाऽऽरोहमारोपितस्तत्कालरजसा रजनीभूत इवासाधुमर्यादोरजस्वलाक्षोऽपि दिग्देवता अतिरजस्वलमतिर्न विजानाति॥ ९॥ क्‍वचित्सकृदवगतविषयवैतथ्यः स्वयं पराभिध्यानेन विभ्रंशितस्मृतिस्तयैव मरीचितोयप्रायांस्तानेवाभिधावति॥ १०॥ क्‍वचि दुलूकझिल्लीस्वनवदतिपरुषरभसाटोपं१ प्रत्यक्षं परोक्षं वा रिपुराजकुलनिर्भर्त्सितेनातिव्यथितकर्णमूलहृदयः॥ ११॥

kvacitsakṛdavagataviṣayavaitathyaḥ svayaṃ parābhidhyānena vibhraṃśitasmṛtistayaiva marīcitoyaprāyāṃstānevābhidhāvati|| 10||

अर्थ

कभी अपने-आप ही एकाध बार विषयोंका मिथ्यात्व जान लेनेपर भी अनादिकालसे देहमें आत्मबुद्धि रहनेसे विवेक-बुद्धि नष्ट हो जानेके कारण उन मरुमरीचिकातुल्य विषयोंकी ओर ही फिर दौड़ने लगता है॥ १०॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—परुषसंरभसाटोपं प्रत्यक्षं वा रिपुराज०।

    (मुद्रित पृष्ठ 632)

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