श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.13.4

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

निवासतोयद्रविणात्मबुद्धि-

स्ततस्ततो धावति भो अटव्याम्।

क्‍वचिच्च वात्योत्थितपांसुधूम्रा

दिशो न जानाति रजस्वलाक्षः॥ ४

nivāsatoyadraviṇātmabuddhi-

statastato dhāvati bho aṭavyām|

kvacicca vātyotthitapāṃsudhūmrā

diśo na jānāti rajasvalākṣaḥ|| 4

अर्थ

यह वणिक्-समुदाय इस वनमें निवासस्थान, जल और धनादिमें आसक्त होकर इधर-उधर भटकता रहता है। कभी बवंडरसे उठी हुई धूलके द्वारा जब सारी दिशाएँ धूमाच्छादित-सी हो जाती हैं और इसकी आँखोंमें भी धूल भर जाती है, तो इसे दिशाओंका ज्ञान भी नहीं रहता॥ ४॥

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