श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.13.16

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

प्रसज्जति क्‍वापि लताभुजाश्रय-

स्तदाश्रयाव्यक्तपदद्विजस्पृहः ।

क्‍वचित्कदाचिद्धरिचक्रतस्त्रसन्

सख्यं विधत्ते बककङ्कगृध्रैः॥ १६

prasajjati kvāpi latābhujāśraya-

stadāśrayāvyaktapadadvijaspṛhaḥ |

kvacitkadāciddharicakratastrasan

sakhyaṃ vidhatte bakakaṅkagṛdhraiḥ|| 16

अर्थ

इस भवाटवीमें भटकनेवाला यह बनिजारोंका दल कभी किसी लताकी डालियोंका आश्रय लेता है और उसपर रहनेवाले मधुरभाषी पक्षियोंके मोहमें फँस जाता है। कभी सिंहोंके समूहसे भय मानकर बगुला, कंक और गिद्धोंसे प्रीति करता है॥ १६॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें