साथियोंमेंसे जो-जो मरते जाते हैं, उन्हें जहाँ-का-तहाँ छोड़कर नवीन उत्पन्न हुओंको साथ लिये वह बनिजारोंका समूह बराबर आगे ही बढ़ता रहता है। वीरवर! उनमेंसे कोई भी प्राणी न तो आजतक वापस लौटा है और न किसीने इस संकटपूर्ण मार्गको पार करके परमानन्दमय योगकी ही शरण ली है॥ १४॥
तांस्तान् विपन्नान् स हि तत्र तत्र
विहाय जातं परिगृह्य सार्थः।
आवर्ततेऽद्यापि न कश्चिदत्र
वीराध्वनः पारमुपैति योगम्॥ १४
साथियोंमेंसे जो-जो मरते जाते हैं, उन्हें जहाँ-का-तहाँ छोड़कर नवीन उत्पन्न हुओंको साथ लिये वह बनिजारोंका समूह बराबर आगे ही बढ़ता रहता है। वीरवर! उनमेंसे कोई भी प्राणी न तो आजतक वापस लौटा है और न किसीने इस संकटपूर्ण मार्गको पार करके परमानन्दमय योगकी ही शरण ली है॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.13.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 627) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/13/14/