श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.13.14

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

तांस्तान् विपन्‍नान् स हि तत्र तत्र

विहाय जातं परिगृह्य सार्थः।

आवर्ततेऽद्यापि न कश्चिदत्र

वीराध्वनः पारमुपैति योगम्॥ १४

tāṃstān vipannān sa hi tatra tatra

vihāya jātaṃ parigṛhya sārthaḥ|

āvartate'dyāpi na kaścidatra

vīrādhvanaḥ pāramupaiti yogam|| 14

अर्थ

साथियोंमेंसे जो-जो मरते जाते हैं, उन्हें जहाँ-का-तहाँ छोड़कर नवीन उत्पन्‍न हुओंको साथ लिये वह बनिजारोंका समूह बराबर आगे ही बढ़ता रहता है। वीरवर! उनमेंसे कोई भी प्राणी न तो आजतक वापस लौटा है और न किसीने इस संकटपूर्ण मार्गको पार करके परमानन्दमय योगकी ही शरण ली है॥ १४॥

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