श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.12.8

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

यदा क्षितावेव चराचरस्य

विदाम निष्ठां प्रभवं च नित्यम्।

तन्‍नामतोऽन्यद् व्यवहारमूलं

निरूप्यतां सत् क्रिययानुमेयम्॥ ८

yadā kṣitāveva carācarasya

vidāma niṣṭhāṃ prabhavaṃ ca nityam|

tannāmato'nyad vyavahāramūlaṃ

nirūpyatāṃ sat kriyayānumeyam|| 8

अर्थ

हम देखते हैं कि सम्पूर्ण चराचर भूत सर्वदा पृथ्वीसे ही उत्पन्‍न होते हैं और पृथ्वीमें ही लीन होते हैं; अतः उनके क्रियाभेदके कारण जो अलग-अलग नाम पड़ गये हैं—बताओ तो, उनके सिवा व्यवहारका और क्या मूल है?॥ ८॥

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