श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.12.2

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

ज्वरामयार्तस्य यथागदं सत्

निदाघदग्धस्य यथा हिमाम्भः।

कुदेहमानाहिविदष्टदृष्टे-

र्ब्रह्मन् वचस्तेऽमृतमौषधं मे॥ २

jvarāmayārtasya yathāgadaṃ sat

nidāghadagdhasya yathā himāmbhaḥ|

kudehamānāhividaṣṭadṛṣṭe-

rbrahman vacaste'mṛtamauṣadhaṃ me|| 2

अर्थ

ब्रह्मन्! जिस प्रकार ज्वरसे पीड़ित रोगीके लिये मीठी ओषधि और धूपसे तपे हुए पुरुषके लिये शीतल जल अमृततुल्य होता है, उसी प्रकार मेरे लिये, जिसकी विवेकबुद्धिको देहाभिमानरूप विषैले सर्पने डस लिया है, आपके वचन अमृतमय ओषधिके समान हैं॥ २॥

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