श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.11.4

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

यावन्मनो रजसा पूरुषस्य

सत्त्वेन वा तमसा वानुरुद्धम्।

चेतोभिराकूतिभिरातनोति

निरङ्कुशं कुशलं चेतरं वा॥ ४

yāvanmano rajasā pūruṣasya

sattvena vā tamasā vānuruddham|

cetobhirākūtibhirātanoti

niraṅkuśaṃ kuśalaṃ cetaraṃ vā|| 4

अर्थ

जबतक मनुष्यका मन सत्त्व, रज अथवा तमोगुणके वशीभूत रहता है, तबतक वह बिना किसी अंकुशके उसकी ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियोंसे शुभाशुभ कर्म कराता रहता है॥ ४॥

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