श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.11.13

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः पुराणः

साक्षात्स्वयंज्योतिरजः परेशः।

नारायणो भगवान् वासुदेवः

स्वमाययाऽऽत्मन्यवधीयमानः ॥ १३

kṣetrajña ātmā puruṣaḥ purāṇaḥ

sākṣātsvayaṃjyotirajaḥ pareśaḥ|

nārāyaṇo bhagavān vāsudevaḥ

svamāyayā''tmanyavadhīyamānaḥ || 13

अर्थ

यह क्षेत्रज्ञ परमात्मा सर्वव्यापक, जगत‍्का आदिकारण, परिपूर्ण, अपरोक्ष, स्वयंप्रकाश, अजन्मा, ब्रह्मादिका भी नियन्ता और अपने अधीन रहनेवाली मायाके द्वारा सबके अन्तःकरणोंमें रहकर जीवोंको प्रेरित करनेवाला समस्त भूतोंका आश्रयरूप भगवान् वासुदेव है॥ १३॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें