श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.10.21

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

दृष्टः श्रमः कर्मत आत्मनो वै

भर्तुर्गन्तुर्भवतश्चानुमन्ये ।

यथासतोदानयनाद्यभावात्

समूल इष्टो व्यवहारमार्गः॥ २१

dṛṣṭaḥ śramaḥ karmata ātmano vai

bharturganturbhavataścānumanye |

yathāsatodānayanādyabhāvāt

samūla iṣṭo vyavahāramārgaḥ|| 21

अर्थ

मैंने युद्धादि कर्मोंमें अपनेको श्रम होते देखा है, इसलिये मेरा अनुमान है कि बोझा ढोने और मार्गमें चलनेसे आपको भी अवश्य ही होता होगा। मुझे तो व्यवहारमार्ग भी सत्य ही जान पड़ता है; क्योंकि मिथ्या घड़ेसे जल लाना आदि कार्य नहीं होता॥ २१॥✎ 447

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #447 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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