श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.10.18

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

तद् ब्रूह्यसङ्गो जडवन्‍निगूढ-

विज्ञानवीर्यो विचरस्यपारः।

वचांसि योगग्रथितानि साधो

न नः क्षमन्ते मनसापि भेत्तुम्॥ १८

tad brūhyasaṅgo jaḍavannigūḍha-

vijñānavīryo vicarasyapāraḥ|

vacāṃsi yogagrathitāni sādho

na naḥ kṣamante manasāpi bhettum|| 18

अर्थ

अतः कृपया बतलाइये, इस प्रकार अपने विज्ञान और शक्तिको छिपाकर मूर्खोंकी भाँति विचरनेवाले आप कौन हैं? विषयोंसे तो आप सर्वथा अनासक्त जान पड़ते हैं। मुझे आपकी कोई थाह नहीं मिल रही है। साधो! आपके योगयुक्त वाक्योंकी बुद्धिद्वारा आलोचना करनेपर भी मेरा सन्देह दूर नहीं होता॥ १८॥

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