॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.10.1
अथ दशमोऽध्यायः
जडभरत और राजा रहूगणकी भेंट
श्रीशुक उवाच
अथ सिन्धुसौवीरपते१ रहूगणस्य व्रजत इक्षुमत्यास्तटे तत्कुलपतिना शिबि२कावाहपुरुषान्वेषणसमये३ दैवेनोपसादितः स द्विजवर उपलब्ध एष पीवा यु४वा संहननाङ्गो गोखरवद्धुरं वोढुमलमिति पूर्वविष्टिगृहीतैः सह गृहीतः प्रसभमतदर्ह५ उवाह शिबिकां स महानुभावः॥ १॥✎ 940
atha sindhusauvīrapate rahūgaṇasya vrajata ikṣumatyāstaṭe tatkulapatinā śibikāvāhapuruṣānveṣaṇasamaye daivenopasāditaḥ sa dvijavara upalabdha eṣa pīvā yuvā saṃhananāṅgo gokharavaddhuraṃ voḍhumalamiti pūrvaviṣṭigṛhītaiḥ saha gṛhītaḥ prasabhamatadarha uvāha śibikāṃ sa mahānubhāvaḥ|| 1||
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! एक बार सिन्धुसौवीर देशका स्वामी राजा रहूगण पालकीपर चढ़कर जा रहा था। जब वह इक्षुमती नदीके किनारे पहुँचा तब उसकी पालकी उठानेवाले कहारोंके जमादारको एक कहारकी आवश्यकता पड़ी। कहारकी खोज करते समय दैववश उसे ये ब्राह्मणदेवता मिल गये। इन्हें देखकर उसने सोचा, ‘यह मनुष्य हृष्ट-पुष्ट, जवान और गठीले अंगोंवाला है। इसलिये यह तो बैल या गधेके समान अच्छी तरह बोझा ढो सकता है।’ यह सोचकर उसने बेगारमें पकड़े हुए अन्य कहारोंके साथ इन्हें भी बलात् पकड़कर पालकीमें जोड़ दिया। महात्मा भरतजी यद्यपि किसी प्रकार इस कार्यके योग्य नहीं थे, तो भी वे बिना कुछ बोले चुपचाप पालकीको उठा ले चले॥ १॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—सिन्धुपते।
- २
प्रा० पा०—शिबिकावाहक०।
- ३
प्रा० पा०—पुरुषान्वेषसमये।
- ४
प्रा० पा०—यावान् संहननांगो।
- ५
प्रा० पा०—मतदर्पण०।