श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.1.9

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

अथ ह भगवानादिदेव एतस्य गुणविसर्गस्य४ परिबृंहणानुध्यानव्यवसितसकलजगदभिप्राय आत्मयोनिरखि५लनिगमनिजगणपरिवेष्टितः स्वभवनादवततार॥ ७॥ स तत्र६ तत्र गगनतल उडुपतिरिव विमानावलिभिरनुपथममरपरिवृढैर७भिपूज्यमानः पथि पथि च वरूथशः सिद्धगन्धर्वसाध्यचारणमुनिगणैरुपगीयमानो गन्धमादनद्रोणीमवभासयन्‍नुपससर्प॥ ८॥ तत्र ह वा एनं देवर्षिर्हंसयानेन पितरं भगवन्तं हिरण्यगर्भमुपलभमानः सहसैवोत्थायार्हणेन सह पितापुत्राभ्यामवहिताञ्जलिरुपतस्थे॥ ९॥ ✎ 926

tatra ha vā enaṃ devarṣirhaṃsayānena pitaraṃ bhagavantaṃ hiraṇyagarbhamupalabhamānaḥ sahasaivotthāyārhaṇena saha pitāputrābhyāmavahitāñjalirupatasthe|| 9||

अर्थ

प्रियव्रतको आत्मविद्याका उपदेश देनेके लिये वहाँ नारदजी भी आये हुए थे। ब्रह्माजीके वहाँ पहुँचनेपर उनके वाहन हंसको देखकर देवर्षि नारद जान गये कि हमारे पिता भगवान् ब्रह्माजी पधारे हैं; अतः वे स्वायम्भुव मनु और प्रियव्रतके सहित तुरंत खड़े हो गये और सबने उनको हाथ जोड़कर प्रणाम किया॥ ९॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—सर्गस्य बृंहणा।

    (मुद्रित पृष्ठ 576)
  2. ५

    प्रा० पा०—रखिलनिजगणपरिवेष्टितः।

    (मुद्रित पृष्ठ 576)
  3. ६

    प्रा० पा०—तत्र गगनतले।

    (मुद्रित पृष्ठ 576)
  4. ७

    प्रा० पा०—ममरपरिवृन्दैरभिपू०।

    (मुद्रित पृष्ठ 576)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #926 शब्दोंके बीचका स्थान: स्वभवनादवततार॥७॥ → स्वभवनादवततार॥ ७॥

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