श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.1.7

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

अथ ह भगवानादिदेव एतस्य गुणविसर्गस्य४ परिबृंहणानुध्यानव्यवसितसकलजगदभिप्राय आत्मयोनिरखि५लनिगमनिजगणपरिवेष्टितः स्वभवनादवततार॥ ७॥ स तत्र६ तत्र गगनतल उडुपतिरिव विमानावलिभिरनुपथममरपरिवृढैर७भिपूज्यमानः पथि पथि च वरूथशः सिद्धगन्धर्वसाध्यचारणमुनिगणैरुपगीयमानो गन्धमादनद्रोणीमवभासयन्‍नुपससर्प॥ ८॥ तत्र ह वा एनं देवर्षिर्हंसयानेन पितरं भगवन्तं हिरण्यगर्भमुपलभमानः सहसैवोत्थायार्हणेन सह पितापुत्राभ्यामवहिताञ्जलिरुपतस्थे॥ ९॥ ✎ 926

atha ha bhagavānādideva etasya guṇavisargasya paribṛṃhaṇānudhyānavyavasitasakalajagadabhiprāya ātmayonirakhilanigamanijagaṇapariveṣṭitaḥ svabhavanādavatatāra|| 7||

अर्थ

आदिदेव स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माजीको निरन्तर इस गुणमय प्रपंचकी वृद्धिका ही विचार रहता है। वे सारे संसारके जीवोंका अभिप्राय जानते रहते हैं। जब उन्होंने प्रियव्रतकी ऐसी प्रवृत्ति देखी, तब वे मूर्तिमान् चारों वेद और मरीचि आदि पार्षदोंको साथ लिये अपने लोकसे उतरे॥ ७॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—सर्गस्य बृंहणा।

    (मुद्रित पृष्ठ 576)
  2. ५

    प्रा० पा०—रखिलनिजगणपरिवेष्टितः।

    (मुद्रित पृष्ठ 576)
  3. ६

    प्रा० पा०—तत्र गगनतले।

    (मुद्रित पृष्ठ 576)
  4. ७

    प्रा० पा०—ममरपरिवृन्दैरभिपू०।

    (मुद्रित पृष्ठ 576)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #926 शब्दोंके बीचका स्थान: स्वभवनादवततार॥७॥ → स्वभवनादवततार॥ ७॥

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