॥ श्रीहरिः ॥
भौमं दिव्यं मानुषं च महित्वं कर्मयोगजम्।
यश्चक्रे निरयौपम्यं पुरुषानुजनप्रियः॥ ४१
bhaumaṃ divyaṃ mānuṣaṃ ca mahitvaṃ karmayogajam|
yaścakre nirayaupamyaṃ puruṣānujanapriyaḥ|| 41
अर्थ
महाराज प्रियव्रतके विषयमें निम्नलिखित लोकोक्ति प्रसिद्ध है—
यह व्याख्या श्लोक 5.1.39 से 5.1.41 तककी एक साथ है।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे प्रियव्रतविजये प्रथमोऽध्यायः॥ १॥
भौमं दिव्यं मानुषं च महित्वं कर्मयोगजम्।
यश्चक्रे निरयौपम्यं पुरुषानुजनप्रियः॥ ४१
महाराज प्रियव्रतके विषयमें निम्नलिखित लोकोक्ति प्रसिद्ध है—
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.1.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 582) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/1/41/