sa evamaparimitabalaparākrama ekadā tu devarṣicaraṇānuśayanānupatitaguṇavisargasaṃsargeṇānirvṛtamivātmānaṃ manyamāna ātmanirveda idamāha|| 36||
अर्थ
इस प्रकार अतुलनीय बल-पराक्रमसे युक्त महाराज प्रियव्रत एक बार, अपनेको देवर्षि नारदके चरणोंकी शरणमें जाकर भी पुनः दैववश प्राप्त हुए प्रपंचमें फँस जानेसे अशान्त-सा देख, मन-ही-मन विरक्त होकर इस प्रकार कहने लगे॥ ३६॥
स एवमपरिमितबलपराक्रम एकदा तु देवर्षिचरणानुशयनानुपतितगुणविसर्गसंसर्गेणानिर्वृतमिवात्मानं मन्यमान आत्मनिर्वेद इदमाह॥ ३६॥
इस प्रकार अतुलनीय बल-पराक्रमसे युक्त महाराज प्रियव्रत एक बार, अपनेको देवर्षि नारदके चरणोंकी शरणमें जाकर भी पुनः दैववश प्राप्त हुए प्रपंचमें फँस जानेसे अशान्त-सा देख, मन-ही-मन विरक्त होकर इस प्रकार कहने लगे॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.1.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 581) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/5/1/36/