श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.1.2

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

न नूनं मुक्तसङ्गानां तादृशानां द्विजर्षभ।

गृहेष्वभिनिवेशोऽयं१ पुंसां भवितुमर्हति॥ २

na nūnaṃ muktasaṅgānāṃ tādṛśānāṃ dvijarṣabha|

gṛheṣvabhiniveśo'yaṃ puṃsāṃ bhavitumarhati|| 2

अर्थ

विप्रवर! निश्‍चय ही ऐसे निःसंग महापुरुषोंका इस प्रकार गृहस्थाश्रममें अभिनिवेश होना उचित नहीं है॥ २॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—निवासोऽयम्।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 575)

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