॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.9.58
ध्रुवाय पथि दृष्टाय तत्र तत्र पुरस्त्रियः।
सिद्धार्थाक्षतदध्यम्बुदूर्वापुष्पफलानि च॥ ५८
dhruvāya pathi dṛṣṭāya tatra tatra purastriyaḥ|
siddhārthākṣatadadhyambudūrvāpuṣpaphalāni ca|| 58
अर्थ
ध्रुवजी राजमार्गसे जा रहे थे। उस समय जहाँ-तहाँ नगरकी शीलवती सुन्दरियाँ उन्हें देखनेको एकत्र हो रही थीं। उन्होंने वात्सल्यभावसे अनेकों शुभाशीर्वाद देते हुए उनपर सफेद सरसों, अक्षत, दही, जल, दूर्वा, पुष्प और फलोंकी वर्षा की। इस प्रकार उनके मनोहर गीत सुनते हुए ध्रुवजीने अपने पिताके महलमें प्रवेश किया॥ ५८-५९॥