॥ श्रीहरिः ॥
चूतपल्लववासःस्रङ्मुक्तादामविलम्बिभिः।
उपस्कृतं प्रतिद्वारमपां कुम्भैः सदीपकैः॥ ५५
cūtapallavavāsaḥsraṅmuktādāmavilambibhiḥ|
upaskṛtaṃ pratidvāramapāṃ kumbhaiḥ sadīpakaiḥ|| 55
अर्थ
द्वार-द्वारपर दीपकके सहित जलके कलश रखे हुए थे—जो आमके पत्तों, वस्त्रों, पुष्पमालाओं तथा मोतीकी लड़ियोंसे सुसज्जित थे॥ ५५॥
चूतपल्लववासःस्रङ्मुक्तादामविलम्बिभिः।
उपस्कृतं प्रतिद्वारमपां कुम्भैः सदीपकैः॥ ५५
द्वार-द्वारपर दीपकके सहित जलके कलश रखे हुए थे—जो आमके पत्तों, वस्त्रों, पुष्पमालाओं तथा मोतीकी लड़ियोंसे सुसज्जित थे॥ ५५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.9.55 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 459) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/9/55/