मैं बड़ा ही पुण्यहीन हूँ! जिस प्रकार कोई कँगला किसी चक्रवर्ती सम्राट्को प्रसन्न करके उससे तुषसहित चावलोंकी कनी माँगे, उसी प्रकार मैंने भी आत्मानन्द प्रदान करनेवाले श्रीहरिसे मूर्खतावश व्यर्थका अभिमान बढ़ानेवाले उच्चपदादि ही माँगे हैं॥ ३५॥✎ 3771598
स्वाराज्यं यच्छतो मौढ्यान्मानो मे भिक्षितो बत।
ईश्वरात्क्षीणपुण्येन फलीकारानिवाधनः॥ ३५
मैं बड़ा ही पुण्यहीन हूँ! जिस प्रकार कोई कँगला किसी चक्रवर्ती सम्राट्को प्रसन्न करके उससे तुषसहित चावलोंकी कनी माँगे, उसी प्रकार मैंने भी आत्मानन्द प्रदान करनेवाले श्रीहरिसे मूर्खतावश व्यर्थका अभिमान बढ़ानेवाले उच्चपदादि ही माँगे हैं॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.9.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 457) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/9/35/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)