श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.33

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

दैवीं मायामुपाश्रित्य प्रसुप्त इव भिन्‍नदृक्।

तप्ये द्वितीयेऽप्यसति भ्रातृभ्रातृव्यहृद्रुजा॥ ३३

daivīṃ māyāmupāśritya prasupta iva bhinnadṛk|

tapye dvitīye'pyasati bhrātṛbhrātṛvyahṛdrujā|| 33

अर्थ

यद्यपि संसारमें आत्माके सिवा दूसरा कोई भी नहीं है; तथापि सोया हुआ मनुष्य जैसे स्वप्नमें अपने ही कल्पना किये हुए व्याघ्रादिसे डरता है, उसी प्रकार मैंने भी भगवान्‌की मायासे मोहित होकर भाईको ही शत्रु मान लिया और व्यर्थ ही द्वेषरूप हार्दिक रोगसे जलने लगा॥ ३३॥✎ 377 1598

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #377 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1598 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: तपस्या-द्वारा → तपस्याद्वारा

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