श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.2

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

स वै धिया योगविपाकतीव्रया

हृत्पद्मकोशे स्फुरितं तडित्प्रभम्।

तिरोहितं सहसैवोपलक्ष्य

बहिःस्थितं तदवस्थं ददर्श॥ २

sa vai dhiyā yogavipākatīvrayā

hṛtpadmakośe sphuritaṃ taḍitprabham|

tirohitaṃ sahasaivopalakṣya

bahiḥsthitaṃ tadavasthaṃ dadarśa|| 2

अर्थ

उस समय ध्रुवजी तीव्र योगाभ्याससे एकाग्र हुई बुद्धिके द्वारा भगवान्‌की बिजलीके समान देदीप्यमान जिस मूर्तिका अपने हृदयकमलमें ध्यान कर रहे थे, वह सहसा विलीन हो गयी। इससे घबराकर उन्होंने ज्यों ही नेत्र खोले कि भगवान्‌के उसी रूपको बाहर अपने सामने खड़ा देखा॥ २॥✎ 374

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #374 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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