॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.8.82
श्रीभगवानुवाच
मा भैष्ट बालं तपसो दुरत्यया-
न्निवर्तयिष्ये प्रतियात स्वधाम।
यतो हि वः प्राणनिरोध आसी-
दौत्तानपादिर्मयि संगतात्मा॥ ८२
mā bhaiṣṭa bālaṃ tapaso duratyayā-
nnivartayiṣye pratiyāta svadhāma|
yato hi vaḥ prāṇanirodha āsī-
dauttānapādirmayi saṃgatātmā|| 82
अर्थ
श्रीभगवान्ने कहा—देवताओ! तुम डरो मत। उत्तानपादके पुत्र ध्रुवने अपने चित्तको मुझ विश्वात्मामें लीन कर दिया है, इस समय मेरे साथ उसकी अभेदधारणा सिद्ध हो गयी है, इसीसे उसके प्राणनिरोधसे तुम सबका प्राण भी रुक गया है। अब तुम अपने-अपने लोकोंको जाओ, मैं उस बालकको इस दुष्कर तपसे निवृत्त कर दूँगा॥ ८२॥✎ 373
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे
ध्रुवचरितेऽष्टमोऽध्यायः॥ ८॥