श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.80

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

तस्मिन्‍नभिध्यायति विश्‍वमात्मनो

द्वारं निरुध्यासुमनन्यया धिया।

लोका निरुच्छ्वासनिपीडिता भृशं

सलोकपालाः शरणं ययुर्हरिम्॥ ८०

tasminnabhidhyāyati viśvamātmano

dvāraṃ nirudhyāsumananyayā dhiyā|

lokā nirucchvāsanipīḍitā bhṛśaṃ

salokapālāḥ śaraṇaṃ yayurharim|| 80

अर्थ

ध्रुवजी अपने इन्द्रियद्वार तथा प्राणोंको रोककर अनन्यबुद्धिसे विश्वात्मा श्रीहरिका ध्यान करने लगे। इस प्रकार उनकी समष्टि प्राणसे अभिन्‍नता हो जानेके कारण सभी जीवोंका श्वास-प्रश्वास रुक गया। इससे समस्त लोक और लोकपालोंको बड़ी पीड़ा हुई और वे सब घबराकर श्रीहरिकी शरणमें गये॥ ८०॥

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