उस समय उन्होंने शब्दादि विषय और इन्द्रियोंके नियामक अपने मनको सब ओरसे खींच लिया तथा हृदयस्थित हरिके स्वरूपका चिन्तन करते हुए चित्तको किसी दूसरी ओर न जाने दिया॥ ७७॥
सर्वतो मन आकृष्य हृदि भूतेन्द्रियाशयम्।
ध्यायन्भगवतो रूपं नाद्राक्षीत्किंचनापरम्॥ ७७
उस समय उन्होंने शब्दादि विषय और इन्द्रियोंके नियामक अपने मनको सब ओरसे खींच लिया तथा हृदयस्थित हरिके स्वरूपका चिन्तन करते हुए चित्तको किसी दूसरी ओर न जाने दिया॥ ७७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.77 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 451) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/8/77/