उनकी तरुण अवस्था है; सभी अंग बड़े सुडौल हैं; लाल-लाल होठ और रतनारे नेत्र हैं। वे प्रणतजनोंको आश्रय देनेवाले, अपार सुखदायक, शरणागतवत्सल और दयाके समुद्र हैं॥ ४६॥✎ 369
तरुणं रमणीयांगमरुणोष्ठेक्षणाधरम्।
प्रणताश्रयणं नृम्णं शरण्यं करुणार्णवम्॥ ४६
उनकी तरुण अवस्था है; सभी अंग बड़े सुडौल हैं; लाल-लाल होठ और रतनारे नेत्र हैं। वे प्रणतजनोंको आश्रय देनेवाले, अपार सुखदायक, शरणागतवत्सल और दयाके समुद्र हैं॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 448) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/8/46/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)