श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.31

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

मुनयः पदवीं यस्य निःसंगेनोरुजन्मभिः।

न विदुर्मृगयन्तोऽपि तीव्रयोगसमाधिना॥ ३१

munayaḥ padavīṃ yasya niḥsaṃgenorujanmabhiḥ|

na vidurmṛgayanto'pi tīvrayogasamādhinā|| 31

अर्थ

योगीलोग अनेकों जन्मोंतक अनासक्त रहकर समाधियोगके द्वारा बड़ी-बड़ी कठोर साधनाएँ करते रहते हैं, परन्तु भगवान्‌के मार्गका पता नहीं पाते॥ ३१॥✎ 367 368

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #367 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #368 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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