‘अहो! क्षत्रियोंका कैसा अद्भुत तेज है, वे थोड़ा-सा भी मान-भंग नहीं सह सकते। देखो, अभी तो यह नन्हा-सा बच्चा है; तो भी इसके हृदयमें सौतेली माताके कटु वचन घर कर गये हैं’॥ २६॥
अहो तेजः क्षत्रियाणां मानभंगममृष्यताम्।
बालोऽप्ययं हृदा धत्ते यत्समातुरसद्वचः॥ २६
‘अहो! क्षत्रियोंका कैसा अद्भुत तेज है, वे थोड़ा-सा भी मान-भंग नहीं सह सकते। देखो, अभी तो यह नन्हा-सा बच्चा है; तो भी इसके हृदयमें सौतेली माताके कटु वचन घर कर गये हैं’॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 446) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/8/26/