श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.22

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

तमेव वत्साश्रय भृत्यवत्सलं

मुमुक्षुभिर्मृग्यपदाब्जपद्धतिम् ।

अनन्यभावे निजधर्मभाविते

मनस्यवस्थाप्य भजस्व पूरुषम्॥ २२

tameva vatsāśraya bhṛtyavatsalaṃ

mumukṣubhirmṛgyapadābjapaddhatim |

ananyabhāve nijadharmabhāvite

manasyavasthāpya bhajasva pūruṣam|| 22

अर्थ

‘बेटा! तू भी उन भक्तवत्सल श्रीभगवान्‌का ही आश्रय ले। जन्म-मृत्युके चक्रसे छूटनेकी इच्छा करनेवाले मुमुक्षुलोग निरन्तर उन्हींके चरणकमलोंके मार्गकी खोज किया करते हैं। तू स्वधर्मपालनसे पवित्र हुए अपने चित्तमें श्रीपुरुषोत्तमभगवान्‌को बैठा ले तथा अन्य सबका चिन्तन छोड़कर केवल उन्हींका भजन कर ॥ २२॥✎ 365 366

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #365 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीपुरुषोत्तमभगवान् को → श्रीपुरुषोत्तमभगवान्‌को
  • #366 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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