श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.7.9

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

संधीयमाने शिर४सि दक्षो रुद्राभिवीक्षितः।

सद्यः सुप्त इवोत्तस्थौ ददृशे चाग्रतो मृडम्॥ ९

saṃdhīyamāne śirasi dakṣo rudrābhivīkṣitaḥ|

sadyaḥ supta ivottasthau dadṛśe cāgrato mṛḍam|| 9

अर्थ

सिर जुड़ जानेपर रुद्रदेवकी दृष्टि पड़ते ही दक्ष तत्काल सोकर जागनेके समान जी उठे और अपने सामने भगवान् शिवको देखा॥ ९॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—शीर्ष्णीह।

    (मुद्रित पृष्ठ 434)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें