विदुरजी! उस हविको हाथमें लेकर खड़े हुए अध्वर्युके साथ यजमान दक्षने ज्यों ही विशुद्ध चित्तसे श्रीहरिका ध्यान किया, त्यों ही सहसा भगवान् वहाँ प्रकट हो गये॥ १८॥✎ 362
अध्वर्युणाऽऽत्तहविषा यजमानो विशाम्पते।
धिया विशुद्धया दध्यौ तथा प्रादुरभूद्धरिः॥ १८
विदुरजी! उस हविको हाथमें लेकर खड़े हुए अध्वर्युके साथ यजमान दक्षने ज्यों ही विशुद्ध चित्तसे श्रीहरिका ध्यान किया, त्यों ही सहसा भगवान् वहाँ प्रकट हो गये॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.7.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 435) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/7/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)