श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.6.45

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

त्वं कर्मणां मंगल मंगलानां

कर्तुः स्म लोकं तनुषे स्वः परं वा।

अमंगलानां च तमिस्रमुल्बणं

विपर्ययः केन तदेव कस्यचित्॥ ४५

tvaṃ karmaṇāṃ maṃgala maṃgalānāṃ

kartuḥ sma lokaṃ tanuṣe svaḥ paraṃ vā|

amaṃgalānāṃ ca tamisramulbaṇaṃ

viparyayaḥ kena tadeva kasyacit|| 45

अर्थ

मंगलमय महेश्‍वर! आप शुभ कर्म करनेवालोंको स्वर्गलोक अथवा मोक्षपद प्रदान करते हैं तथा पापकर्म करनेवालोंको घोर नरकोंमें डालते हैं। फिर भी किसी-किसी व्यक्तिके लिये इन कर्मोंका फल उलटा कैसे हो जाता है?॥ ४५॥

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