भगवन्! आप मकड़ीके समान ही अपने स्वरूपभूत शिव-शक्तिके रूपमें क्रीडा करते हुए लीलासे ही संसारकी रचना, पालन और संहार करते रहते हैं॥ ४३॥
त्वमेव भगवन्नेतच्छिवशक्त्योः सरूपयोः।
विश्वं सृजसि पास्यत्सि क्रीडन्नूर्णपटो यथा॥ ४३
भगवन्! आप मकड़ीके समान ही अपने स्वरूपभूत शिव-शक्तिके रूपमें क्रीडा करते हुए लीलासे ही संसारकी रचना, पालन और संहार करते रहते हैं॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.6.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 432) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/6/43/