॥ श्रीहरिः ॥
लिंगं च तापसाभीष्टं भस्मदण्डजटाजिनम्।
अंगेन संध्याभ्ररुचा चन्द्रलेखां च बिभ्रतम्॥ ३६
liṃgaṃ ca tāpasābhīṣṭaṃ bhasmadaṇḍajaṭājinam|
aṃgena saṃdhyābhrarucā candralekhāṃ ca bibhratam|| 36
अर्थ
सन्ध्याकालीन मेघकी-सी कान्तिवाले शरीरपर वे तपस्वियोंके अभीष्ट चिह्न—भस्म, दण्ड, जटा और मृगचर्म एवं मस्तकपर चन्द्रकला धारण किये हुए थे॥ ३६॥
लिंगं च तापसाभीष्टं भस्मदण्डजटाजिनम्।
अंगेन संध्याभ्ररुचा चन्द्रलेखां च बिभ्रतम्॥ ३६
सन्ध्याकालीन मेघकी-सी कान्तिवाले शरीरपर वे तपस्वियोंके अभीष्ट चिह्न—भस्म, दण्ड, जटा और मृगचर्म एवं मस्तकपर चन्द्रकला धारण किये हुए थे॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.6.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 431) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/6/36/