॥ श्रीहरिः ॥
मयूरकेकाभिरुतं मदान्धालिविमूर्च्छितम्।
प्लावितै रक्तकण्ठानां कूजितैश्च पतत्त्रिणाम्॥ १२
mayūrakekābhirutaṃ madāndhālivimūrcchitam|
plāvitai raktakaṇṭhānāṃ kūjitaiśca patattriṇām|| 12
अर्थ
वह सब ओर मोरोंके शोर, मदान्ध भ्रमरोंके गुंजार, कोयलोंकी कुहू-कुहू ध्वनि तथा अन्यान्य पक्षियोंके कलरवसे गूँज रहा है॥ १२॥
मयूरकेकाभिरुतं मदान्धालिविमूर्च्छितम्।
प्लावितै रक्तकण्ठानां कूजितैश्च पतत्त्रिणाम्॥ १२
वह सब ओर मोरोंके शोर, मदान्ध भ्रमरोंके गुंजार, कोयलोंकी कुहू-कुहू ध्वनि तथा अन्यान्य पक्षियोंके कलरवसे गूँज रहा है॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.6.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 429) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/6/12/