श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.5.16

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

अबाधन्त मुनीनन्य एके पत्नीरतर्जयन्।

अपरे जगृहुर्देवान् प्रत्यासन्‍नान् पलायितान्॥ १६

abādhanta munīnanya eke patnīratarjayan|

apare jagṛhurdevān pratyāsannān palāyitān|| 16

अर्थ

कोई-कोई मुनियोंको तंग करने लगे, कोई स्त्रियोंको डराने-धमकाने लगे और किन्हींने अपने पास होकर भागते हुए देवताओंको पकड़ लिया॥ १६॥

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