॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.4.12
दोषान् परेषां हि गुणेषु साधवो
गृह्णन्ति केचिन्न भवादृशा द्विज।
गुणांश्च फल्गून् बहुलीकरिष्णवो
महत्तमास्तेष्वविदद्भवानघम् ॥ १२
doṣān pareṣāṃ hi guṇeṣu sādhavo
gṛhṇanti kecinna bhavādṛśā dvija|
guṇāṃśca phalgūn bahulīkariṣṇavo
mahattamāsteṣvavidadbhavānagham || 12
अर्थ
द्विजवर! आप-जैसे लोग दूसरोंके गुणोंमें भी दोष ही देखते हैं, किन्तु कोई साधुपुरुष ऐसा नहीं करते। जो लोग—दोष देखनेकी बात तो अलग रही—दूसरोंके थोड़ेसे गुणको भी बड़े रूपमें देखना चाहते हैं, वे सबसे श्रेष्ठ हैं। खेद है कि आपने ऐसे महापुरुषोंपर भी दोषारोपण ही किया॥ १२॥✎ 358