श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.31.6

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

यदादिष्टं भगवता शिवेनाधोक्षजेन च।

तद् गृहेषु प्रसक्तानां प्रायशः२ क्षपितं प्रभो॥ ६

yadādiṣṭaṃ bhagavatā śivenādhokṣajena ca|

tad gṛheṣu prasaktānāṃ prāyaśaḥ kṣapitaṃ prabho|| 6

अर्थ

प्रभो! भगवान् शंकर और श्रीविष्णुभगवान्‌ने हमें जो उपदेश दिया था, उसे गृहस्थीमें आसक्त रहनेके कारण हमलोग प्रायः भूल गये हैं॥ ६॥✎ 426

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—प्रायो नः।

    (मुद्रित पृष्ठ 570)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #426 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीविष्णुभगवान् ने → श्रीविष्णुभगवान्‌ने

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