श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.30.41

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

मनुः स्वयम्भूर्भगवान् भवश्‍च

येऽन्ये तपोज्ञानविशुद्धसत्त्वाः।

अदृष्टपारा अपि यन्महिम्नः

स्तुवन्त्यथो त्वाऽऽत्मसमं गृणीमः॥ ४१

manuḥ svayambhūrbhagavān bhavaśca

ye'nye tapojñānaviśuddhasattvāḥ|

adṛṣṭapārā api yanmahimnaḥ

stuvantyatho tvā''tmasamaṃ gṛṇīmaḥ|| 41

अर्थ

स्वामिन्! आपकी महिमाका पार न पाकर भी स्वायम्भुव मनु, स्वयं ब्रह्माजी, भगवान् शंकर तथा तप और ज्ञानसे शुद्धचित्त हुए अन्य पुरुष निरन्तर आपकी स्तुति करते रहते हैं। अतः हम भी अपनी बुद्धिके अनुसार आपका यशोगान करते हैं॥ ४१॥

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