॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.3.16
श्रीभगवानुवाच
त्वयोदितं शोभनमेव शोभने
अनाहुता अप्यभियन्ति बन्धुषु।
ते यद्यनुत्पादितदोषदृष्टयो
बलीयसानात्म्यमदेन मन्युना॥ १६
tvayoditaṃ śobhanameva śobhane
anāhutā apyabhiyanti bandhuṣu|
te yadyanutpāditadoṣadṛṣṭayo
balīyasānātmyamadena manyunā|| 16
अर्थ
भगवान् शंकरने कहा—सुन्दरि! तुमने जो कहा कि अपने बन्धुजनके यहाँ बिना बुलाये भी जा सकते हैं, सो तो ठीक ही है; किंतु ऐसा तभी करना चाहिये, जब उनकी दृष्टि अतिशय प्रबल देहाभिमानसे उत्पन्न हुए मद और क्रोधके कारण द्वेष-दोषसे युक्त न हो गयी हो॥ १६॥