श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.85

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

अध्यात्मपारोक्ष्यमिदं मयाधिगतमद्भुतम्।

एवं स्त्रियाऽऽश्रमः पुंसश्छिन्‍नोऽमुत्र च संशयः॥ ८५

adhyātmapārokṣyamidaṃ mayādhigatamadbhutam|

evaṃ striyā''śramaḥ puṃsaśchinno'mutra ca saṃśayaḥ|| 85

अर्थ

विदुरजी! गृहस्थाश्रमी पुरंजनके रूपकसे परोक्षरूपमें कहा हुआ यह अद्भुत आत्मज्ञान मैंने गुरुजीकी कृपासे प्राप्त किया था। इसका तात्पर्य समझ लेनेसे बुद्धियुक्त जीवका देहाभिमान निवृत्त हो जाता है तथा उसका ‘परलोकमें जीव किस प्रकार कर्मोंका फल भोगता है’ यह संशय भी मिट जाता है॥ ८५॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे विदुरमैत्रेयसंवादे
प्राचीनबर्हिर्नारदसंवादो
* नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    प्रा० पा०—नारदप्राचीन बर्हिःसंवादेऽध्यात्मपारोक्षं नाम।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 564)

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