श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.75

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

अनेन पुरुषो देहानुपादत्ते३ विमुंचति।

हर्षं शोकं भयं दुःखं सुखं चानेन विन्दति॥ ७५

anena puruṣo dehānupādatte vimuṃcati|

harṣaṃ śokaṃ bhayaṃ duḥkhaṃ sukhaṃ cānena vindati|| 75

अर्थ

इसीके द्वारा पुरुष भिन्‍न-भिन्‍न देहोंको ग्रहण करता और त्यागता है तथा इसीसे उसे हर्ष, शोक, भय, दुःख और सुख आदिका अनुभव होता है॥ ७५॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—देहमुपादत्ते।

    (मुद्रित पृष्ठ 562)

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