॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.29.70
नाहं ममेति भावोऽयं पुरुषे व्यवधीयते।
यावद् बुद्धिमनोऽक्षार्थगुणव्यूहो ह्यनादिमान्॥ ७०
nāhaṃ mameti bhāvo'yaṃ puruṣe vyavadhīyate|
yāvad buddhimano'kṣārthaguṇavyūho hyanādimān|| 70
अर्थ
राजन्! जबतक गुणोंका परिणाम एवं बुद्धि, मन, इन्द्रिय और शब्दादि विषयोंका संघात यह अनादि लिंगदेह बना हुआ है, तबतक जीवके अंदर स्थूलदेहके प्रति ‘मैं-मेरा’ इस भावका अभाव नहीं हो सकता॥ ७०॥