श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.65

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

तेनास्य तादृशं राजँल्लिंगिनो देहसम्भवम्।

श्रद्धत्स्वाननुभूतोऽर्थो न मनः स्प्रष्टुमर्हति॥ ६५

tenāsya tādṛśaṃ rājam̐lliṃgino dehasambhavam|

śraddhatsvānanubhūto'rtho na manaḥ spraṣṭumarhati|| 65

अर्थ

राजन्! तुम निश्‍चय मानो कि लिंगदेहके अभिमानी जीवको उसका अनुभव पूर्वजन्ममें हो चुका है; क्योंकि जो वस्तु पहले अनुभव की हुई नहीं होती, उसकी मनमें वासना भी नहीं हो सकती॥ ६५॥

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