श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.50

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

हरिर्देहभृतामात्मा स्वयं प्रकृतिरीश्‍वरः।

तत्पादमूलं शरणं यतः क्षेमो नृणामिह॥ ५०

harirdehabhṛtāmātmā svayaṃ prakṛtirīśvaraḥ|

tatpādamūlaṃ śaraṇaṃ yataḥ kṣemo nṛṇāmiha|| 50

अर्थ

श्रीहरि सम्पूर्ण देहधारियोंके आत्मा, नियामक और स्वतन्त्र कारण हैं; अतः उनके चरणतल ही मनुष्योंके एकमात्र आश्रय हैं और उन्हींसे संसारमें सबका कल्याण हो सकता है॥ ५०॥

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