जो मलिनमति कर्मवादी लोग वेदको कर्मपरक बताते हैं, वे वास्तवमें उसका मर्म नहीं जानते। इसका कारण यही है कि वे अपने स्वरूपभूत लोक (आत्मतत्त्व)को नहीं जानते, जहाँ साक्षात् श्रीजनार्दन भगवान् विराजमान हैं॥ ४८॥✎ 4201608
स्वं लोकं न विदुस्ते वै यत्र देवो जनार्दनः।
आहुर्धूम्रधियो वेदं सकर्मकमतद्विदः॥ ४८
जो मलिनमति कर्मवादी लोग वेदको कर्मपरक बताते हैं, वे वास्तवमें उसका मर्म नहीं जानते। इसका कारण यही है कि वे अपने स्वरूपभूत लोक (आत्मतत्त्व)को नहीं जानते, जहाँ साक्षात् श्रीजनार्दन भगवान् विराजमान हैं॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 558) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/29/48/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#420 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में