श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.45

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

शब्दब्रह्मणि दुष्पारे चरन्त उरुविस्तरे।

मन्त्रलिङ्गैर्व्यवच्छिन्‍नं भजन्तो न विदुः परम्॥ ४५

śabdabrahmaṇi duṣpāre caranta uruvistare|

mantraliṅgairvyavacchinnaṃ bhajanto na viduḥ param|| 45

अर्थ

वेद भी अत्यन्त विस्तृत हैं, उसका पार पाना हँसी-खेल नहीं है। अनेकों महानुभाव उसकी आलोचना करके मन्त्रोंमें बताये हुए वज्र-हस्तत्वादि गुणोंसे युक्त इन्द्रादि देवताओंके रूपमें, भिन्‍न-भिन्‍न कर्मोंके द्वारा, यद्यपि उस परमात्माका ही यजन करते हैं तथापि उसके स्वरूपको वे भी नहीं जानते॥ ४५॥

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